रात्रिशाला

एस.डब्ल्यू.आर.सी तिलोनिया द्वारा किए गए नवाचारों में से यह भी एक नवाचारी कदम था। संस्था के पूर्व मुख्य कार्यकारी (संस्थापक सदस्य) लक्ष्मी नारायणजी ने इस कार्यक्रम को तिलोनिया मे रहकर गहराई से देखा था। इसकी आवश्यकता दूदू पंचायत समिति में भी नजर आ रही थी। संस्था में कार्य की शुरूआत पानी एवं रात्रिशाला से ही की।

रात्रिशाला सबसे पिछडे एवं वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनकी आत्मछवि बेहतर करने एवं बच्चों में सामाजिक न्याय, समता, समानता जैसे लोकतांत्रिक मूल्य विकसित करने में इसकी बडी भूमिका रही है।

रात्रिशाला की कुछ विशिष्ठ विशेषताएँ

  • शिक्षक स्थानीय होता है।
  • शिक्षक सीखने के प्रति उत्सुक एवं संस्था के मूल्यों में विश्वास करते है।
  • शिक्षकों की क्षमतावर्द्धन के लिए सतत प्रयास किए जाते है यथा प्रशिक्षण, सेमिनार, विद्यालयों में जाकर विशेषज्ञों द्वारा सम्बलन
  • विद्यालय प्रबन्धन की समस्त जिम्मेदारी ग्राम शिक्षा समिति को दी गई है।
  • ग्राम शिक्षा समिति सदस्यों का नियमित प्रशिक्षण
  • रात्रिशाला में अधिकांश काम-काजी बच्चें आते है। यह बच्चे सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछडे होते हैं।
  • औपचारिक विद्यालय के मुकाबले इन बच्चों की उम्र व व्यवहारिक ज्ञान अधिक होता है।

संस्था द्वारा रात्रिशाला में किए जाने वाले कार्य

  • शिक्षकों व ग्राम शिक्षा समिति के सदस्यों के साथ समन्वयन, इनकी क्षमतावृद्धि हेतु प्रशिक्षण, मासिक बैठकें एवं कार्यशालाएं
  • ग्राम शिक्षा समिति को अधिकार सम्पन्न बनाना।
  • बच्चों एवं ग्रामीणों के लिए पुस्तकालय
  • बच्चों का शैक्षिक भ्रमण
  • बच्चों में नेतृत्व विकरित करने हेतु बाल संसद का गठन
  • बच्चों के साथ गतिविधि आधारित शिक्षण
  • बच्चों की नियमिति रूप से स्वास्थ्य जाँच
  • बाल में एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन।